जानिए, श्मशान घाट मे शव को अग्नि देने के बाद पीछे मुड़कर क्यू नहीं देखते हैं?

हैलो दोस्तों, गरुड़ पुराण में भगवान विष्णु ने गरुड़ को यमलोक की यात्रा, नर्क योनियों जैसे प्रश्नों का विस्तार से उत्तर दिया है। इसी क्रम में यह भी बताया गया है कि किसी व्यक्ति का दाह संस्कार करने के बाद उसके परिजनों को श्मशान घाट में पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहिए। आखिर क्या है इसका मुख्य धार्मिक कार्य। यही हम लोग जानेंगे आज के इस एपिसोड में। तो चलिए शुरू करते हैं:-

दोस्तों यह बात तो आप सभी लोग ने सुनी होगी कि जिंदगी एक किराए रूपी घर है। जिसे बदलना ही पड़ता है। यानी की मृत्यु निश्चित है। लेकिन फिर भी हर मनुष्य इसके बारे में बात करने से बचता है। और मृत्यु शब्द से भय खाता है।

युधिष्ठिर नहीं यक्ष से कहा था की दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य यही है कि मनुष्य हर दिन किसी न किसी को मरते हुए देखता है। लेकिन स्वयं मरने के बारे में वह कभी नहीं सोचता है। जब की मौत तो सबको एक दिन आना ही है।

दोस्तों हमारा शरीर पांच तत्वों से बना है। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश। और 1 दिन मरने के बाद इसी में मिल जाना है। इसीलिए मनुष्य कितना भी पैसा कमा ले, सब कुछ यहीं छोड़ कर जाना है। और यही संसार का नियम भी है।

गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि जात्स्य हि ध्रुवों मृत्युध्रुव जन्म मृतस्य च। अर्थात जिसने जन्म लिया है उसको मृत्यु निश्चित है। और जिसकी मृत्यु हुई है उसका जन्म भी निश्चित है। यह एक चक्र है जो हमेशा चलता ही रहता है।

हिंदू धर्म में जन्म से लेकर मृत्यु तक कुल 16 संस्कार है। जिनमें सोलहवा संस्कार दाह संस्कार है। यह संस्कार के अंतर्गत कई वैदिक के नियम बताए गए हैं। जिनका पालन करना जरूरी होता है। अन्यथा ऐसा माना जाता है कि इन नियमों के पालन में थोड़ी सी भी चूक हुई तो मृतक को बहुत कष्ट उठाने पड़ते हैं।

सूर्यास्त से पहले दाह संस्कार करना, कपाल क्रिया, पुरुष परिजनों का मुंडन करवाना, पिंडदान एवं श्राद्ध कर्म आदि। इन नियमों का उल्लेख हमें गरुड़ पुराण में मिलता है। इसी में कहा गया है कि दाह संस्कार के नियम के बाद परिजनों को श्मशान के पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहिए।

असल में दोस्तों दाह संस्कार करने के बाद शरीर तो जल जाता है परंतु आत्मा का अस्तित्व वही रहता है। क्योंकि गीता में बताया गया है कि नैन छिंदनती शास्त्राणी, नैन दहती पावक। न नैन क्लेदायंतयापो, न शेषयति मारूत। यानी आत्मा को शास्त्र काट नहीं सकती, आग जला नहीं सकती, जल गला नहीं सकता, वायु सुखा नहीं सकती। और आत्मा सारे कर्मों को आंखों से देखती है।

गरुड़ पुराण में आगे बताया गया है कि मृत्यु के बाद भी कुछ आत्मा का अपने परिजनों के साथ जबरदस्त मोहक बना रहता है। जिससे आत्मा परिजनों के आसपास भटकती रहती है। इसलिए मृतक की आत्मा को मुक्ति मिलने में काफी कठिनाई होती है। ऐसी स्थिति में मोह का टूटना बहुत जरूरी होता है। अगर ऐसा नहीं होता है तो आत्मा का प्रलोक गमन नहीं हो पाता है।

मृतक की आत्मा और परिजनों के मोह रूपी धागों को तोड़ने के लिए यह स्पष्ट कहा गया है कि मृतक के दाह संस्कार के बाद कोई भी परिजन पीछे मुड़ के ना देखे। अगर किसी ने पीछे मुड़कर देखा तो मृतक की आत्मा को यह लगेगा कि परिजनों के अंदर मेरे प्रति अभी मोह बरकरार है।

अगर किसी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा तो मृतक की आत्मा को यह समझने में अच्छा होगा कि मृतक को इस लोक में अब समय पूरा हो गया है। और वह अपने मन को दूसरे लोक में जाने के लिए तैयार कर ले।

मृतक की आत्मा और मोह के धागों को तोड़ने के लिए और भी कई कर्म कांड है जो 13 दिनों तक चलते रहते हैं। जिनमें पीछे मुड़कर ना देखना प्रारंभिक चरण में आता है।

श्मशान घाट में परिजनों को जलती हुई चिता को पीछे मुड़कर देखने पर मृतक की आत्मा परिजनों को सता भी सकती है। बच्चे लोग आत्माओं के प्रभाव में जल्दी आ जाते हैं। इसलिए शमशान से लौटते समय बच्चों को आगे रखना चाहिए।

दोस्तों पीछे मुड़ के ना देखना एक प्रकार का संदेश होता है कि हम तुम्हारे परिजनों से संबंध तोड़ने का वक्त आ गया है।

आत्माओं के मूर्ति से जुड़ा एक और महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि जिस मनुष्य की अकाल मृत्यु हो जाती है अर्थात आत्महत्या या फिर दुर्घटना से मृत्यु हो जाती है ऐसे इंसान को जल्दी मुक्ति नहीं मिलती है। अगर उसे कल बहुत ही अच्छे थे तब मिल जाती हैं। वरना काफी कष्ट उठाने पड़ते हैं।

हालांकि गरुड़ पुराण में अकाल मृत्यु को लेकर कई सारे कर्मकांड बताए गए हैं। लेकिन उनका पालन पूरे वैदिक तरीके से होना चाहिए। दोस्तों इसलिए दाह संस्कार के बाद शमशान घाट की तरफ पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहिए।